Friday 7 April 2017

First session 46

यूँ ही कभी किसी मोड़ पर,
जो लड़खड़ाये पैर फिर से।
जो बन गये ताबीज  थे,
झट हो गये सब गैर फिर से।
उलझे हुए सम्बन्ध हैं सब,
स्वार्थवश अनुबन्ध हैं सब;
मन उचट गया इस भीड़ से,
और कर लिया ये बैर फिर से।
                   -विजय वर्मा
                  (फिर से-46)
                01-04-2017

No comments:

Post a Comment