Thursday 2 March 2017

फिर से-42

समय नही अनुकूल हो तो भी,
कर्म को बना के ढाल फिर से।
अगर पसीना उगे बदन  पर,
उसे मोतियों मे ढाल फिर से।।
जब मन करने पर आ जाये,
बाधा रज कण बन बिछ जाये;
साहस का फिर ज्वार उठे और,
भय हो जाये निढाल फिर से।
                   -विजय वर्मा
                   (फिर से-42)
                 02-03-2017

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