Wednesday 15 March 2017

फिर से-45

शेर है तूँ, सोयेगा कब तक,
निकल माँद से दहाड़ फिर से।
हालातों का कब तक रोना,
हालातों को  पछाड़ फिर से।
दुर्बलता तो भ्रम है मन का,
मन सशक्त तो काम क्या तन का;
सिंहनाद की गूँज से,सहमे,
थर थर काँपें पहाड़ फिर से।
                    -विजय वर्मा
                  (फिर से-45)
                16-03-2017

फिर से-44

अंतस मे कैसे उग आया,
प्रणय भाव का द्वीप फिर से।
कुछ तो कहना चाहें लहरें,
आ आ कर के समीप फिर से।।
दूर तलक ना कोई किनारा,
फिर भी लगे ज्यों कोई पुकारा,
इसी भ्रम मे जल उठते हैं,
तूफानो मे भी दीप फिर से।
                    -विजय वर्मा
                   (फिर से-44)
                  15-03-2017

फिर से-43

दूर तलक बस दिखायी देती,
उदास मन की कतार फिर से।
कीमत लग रही इन्सानो की,
शबाब पर है बाजार फिर से।
सभी तरह की सजी  दुकाने,
टंगी खूटियों पर  मुस्काने।
जिसकी भारी जेब,ले  जाये,
छलकता आँखो का प्यार फिर से।
                     -विजय वर्मा
                    (फिर से-43)
                   11-03-2017

Wednesday 8 March 2017

भाव मन के

मन के भाव
स्मृतियों के पुल से होकर,
कोई हँस कर कोई रो कर।
मन मे ना जाने कितने ही,
सुख दुख के टीसो को बो कर।
कोई निपट अकेला चलता,
कोई चलता जग का हो कर।
कोई सिर का ताज हो गया,
कोई चलता बन कर  जोकर।
कोई पा कर भी उदास है,
कोई खुश है खुद को खो कर।

भाव कई जो उधर गये,
फिर ना जाने किधर गये।
कुछ लावारिस सा भटख रहे,
कुछ आँखों मे सँवर गये।
कुछ अब भी वैसे के वैसे,
कुछ राहों मे बिखर गये।
कई उपेक्षित,पड़े आँख मे,
कई ख्वाब बन निखर गये।

भाव कई जो उधर से आये,
अपने साथ स्वपन भी लाये।
कोई चहक रहा अपनो मे,
कोई खड़ा है मुह लटकाये।
कोई आँसू से भीगा है,
कोई खुद से ही शरमाये।
कोई बना दर्द का पुतला,
कोई मन ही मन मुस्काये।
किसी के मुख से शब्द न निकले,
कोई आँधी सा बतियाये।

कुछ छोड़ गये मीठी यादें।
कुछ दर्द,टीस और फरियादें।।

कुछ बन्धन जग से और कस गये।
बन मधुर याद आँखो मे बस गये।।
                   -विजय वर्मा
               08-03-2017
              बस्ती ,उ.प्र.

Thursday 2 March 2017

फिर से-42

समय नही अनुकूल हो तो भी,
कर्म को बना के ढाल फिर से।
अगर पसीना उगे बदन  पर,
उसे मोतियों मे ढाल फिर से।।
जब मन करने पर आ जाये,
बाधा रज कण बन बिछ जाये;
साहस का फिर ज्वार उठे और,
भय हो जाये निढाल फिर से।
                   -विजय वर्मा
                   (फिर से-42)
                 02-03-2017