Wednesday, 15 February, 2017

फिर से

ना  जाने कैसे उग     आयी,
दिल के दरमियाँ दीवार फिर से।
झुकती सी महसूस हो रही,
उम्मीद वाली मीनार फिर से।।
आँख से नींद का यूँ  रूठ जाना,
बीच मे सपनों का टूट जाना;
खुद से ही अनबन लगती है,
मन लगता है बीमार फिर से।
                  -विजय वर्मा
                  (फिर से-38)
                 16-02-2017

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