Saturday 25 February 2017

फिर से

जुनून जूझने का मुश्किलों से,
चाहता हूँ आजमाना फिर से।
फिर से दो चार हाथ हो जाये;
सामने हूँ आ जमाना फिर से।।
तेरी तरकीब सीख आया हूँ,
नये साँचे मे ढल के आया हूँ।
पलट के रख दूँ तेरे दाँव सभी,
तू भी कहना आज माना फिर से।
                    -विजय वर्मा
                    (फिर से-41)
                   25-02-2017

Wednesday 15 February 2017

फिर से

किस प्रिय से मिलने को आतुर,
व्याकुल सी लगती धरा फिर से।
इक तो बसंत ,और अंगड़ाई,
कमनीय रूप धरा फिर से।।
गेंदा,गुलाब,चम्पा ,टेसू,
जूही,बेला से सजे गेसू;
पट पीत सुसोभित सरसो से,
हरियाली से रंग हरा फिर से।
                   -विजय वर्मा
                  (फिर से-39)
                 16-02-2017

फिर से

ना  जाने कैसे उग     आयी,
दिल के दरमियाँ दीवार फिर से।
झुकती सी महसूस हो रही,
उम्मीद वाली मीनार फिर से।।
आँख से नींद का यूँ  रूठ जाना,
बीच मे सपनों का टूट जाना;
खुद से ही अनबन लगती है,
मन लगता है बीमार फिर से।
                  -विजय वर्मा
                  (फिर से-38)
                 16-02-2017