Sunday 16 April 2017

फिर से-51

तुम्हारी आँखों के फैसले पर,
लगी हुई मन की आस फिर से।
बदन नहाया हुआ अश्क से,
मगर लबों पे है प्यास फिर से।।
उलझन मन कु बढ़ती जाये,
कभी हँसाये,कभी रुलाये;
सुखद अन्त हो बस इतना चाहूँ,
बने रहे तेरे खास फिर से।
                 -विजय वर्मा
                (फिर से-51)
              16-04-2017

Wednesday 12 April 2017

फिर से-50

नुकीले काँटों ने पहनी फिर से,
भरोसे वाली लिबास फिर  से।
कुछ तो अनहोनी होनी   है,
बातों मे है मिठास फिर  से।
कहीं झूम के सावन बरसे,
याचक कहीं बूंद बिन तरसे;
किसी के हिस्से मे मयखाना,
किसी के खाली गिलास फिर से।
                        -विजय वर्मा
                       (फिर से-50)
                      13-04-2017

Friday 7 April 2017

फिर से -48

छोड़ किताबें कागज वाली,
सीख समय को पढ़ना फिर से।
बाधायें तो भ्रम हैं मन का,
पल प्रतिपल बस बढ़ना फिर से।
कर्म को,अपनी कलम बना कर,
श्रम से,अपना भाग्य लिखा कर;
जिस से मन विह्वल हो जाये,
उन स्वपनो को गढ़ना फिर से।
                   -विजय वर्मा
                  (फिर से-48)
                02-04-2017

First session 46

यूँ ही कभी किसी मोड़ पर,
जो लड़खड़ाये पैर फिर से।
जो बन गये ताबीज  थे,
झट हो गये सब गैर फिर से।
उलझे हुए सम्बन्ध हैं सब,
स्वार्थवश अनुबन्ध हैं सब;
मन उचट गया इस भीड़ से,
और कर लिया ये बैर फिर से।
                   -विजय वर्मा
                  (फिर से-46)
                01-04-2017

Wednesday 15 March 2017

फिर से-45

शेर है तूँ, सोयेगा कब तक,
निकल माँद से दहाड़ फिर से।
हालातों का कब तक रोना,
हालातों को  पछाड़ फिर से।
दुर्बलता तो भ्रम है मन का,
मन सशक्त तो काम क्या तन का;
सिंहनाद की गूँज से,सहमे,
थर थर काँपें पहाड़ फिर से।
                    -विजय वर्मा
                  (फिर से-45)
                16-03-2017

फिर से-44

अंतस मे कैसे उग आया,
प्रणय भाव का द्वीप फिर से।
कुछ तो कहना चाहें लहरें,
आ आ कर के समीप फिर से।।
दूर तलक ना कोई किनारा,
फिर भी लगे ज्यों कोई पुकारा,
इसी भ्रम मे जल उठते हैं,
तूफानो मे भी दीप फिर से।
                    -विजय वर्मा
                   (फिर से-44)
                  15-03-2017

फिर से-43

दूर तलक बस दिखायी देती,
उदास मन की कतार फिर से।
कीमत लग रही इन्सानो की,
शबाब पर है बाजार फिर से।
सभी तरह की सजी  दुकाने,
टंगी खूटियों पर  मुस्काने।
जिसकी भारी जेब,ले  जाये,
छलकता आँखो का प्यार फिर से।
                     -विजय वर्मा
                    (फिर से-43)
                   11-03-2017

Wednesday 8 March 2017

भाव मन के

मन के भाव
स्मृतियों के पुल से होकर,
कोई हँस कर कोई रो कर।
मन मे ना जाने कितने ही,
सुख दुख के टीसो को बो कर।
कोई निपट अकेला चलता,
कोई चलता जग का हो कर।
कोई सिर का ताज हो गया,
कोई चलता बन कर  जोकर।
कोई पा कर भी उदास है,
कोई खुश है खुद को खो कर।

भाव कई जो उधर गये,
फिर ना जाने किधर गये।
कुछ लावारिस सा भटख रहे,
कुछ आँखों मे सँवर गये।
कुछ अब भी वैसे के वैसे,
कुछ राहों मे बिखर गये।
कई उपेक्षित,पड़े आँख मे,
कई ख्वाब बन निखर गये।

भाव कई जो उधर से आये,
अपने साथ स्वपन भी लाये।
कोई चहक रहा अपनो मे,
कोई खड़ा है मुह लटकाये।
कोई आँसू से भीगा है,
कोई खुद से ही शरमाये।
कोई बना दर्द का पुतला,
कोई मन ही मन मुस्काये।
किसी के मुख से शब्द न निकले,
कोई आँधी सा बतियाये।

कुछ छोड़ गये मीठी यादें।
कुछ दर्द,टीस और फरियादें।।

कुछ बन्धन जग से और कस गये।
बन मधुर याद आँखो मे बस गये।।
                   -विजय वर्मा
               08-03-2017
              बस्ती ,उ.प्र.

Thursday 2 March 2017

फिर से-42

समय नही अनुकूल हो तो भी,
कर्म को बना के ढाल फिर से।
अगर पसीना उगे बदन  पर,
उसे मोतियों मे ढाल फिर से।।
जब मन करने पर आ जाये,
बाधा रज कण बन बिछ जाये;
साहस का फिर ज्वार उठे और,
भय हो जाये निढाल फिर से।
                   -विजय वर्मा
                   (फिर से-42)
                 02-03-2017

Saturday 25 February 2017

फिर से

जुनून जूझने का मुश्किलों से,
चाहता हूँ आजमाना फिर से।
फिर से दो चार हाथ हो जाये;
सामने हूँ आ जमाना फिर से।।
तेरी तरकीब सीख आया हूँ,
नये साँचे मे ढल के आया हूँ।
पलट के रख दूँ तेरे दाँव सभी,
तू भी कहना आज माना फिर से।
                    -विजय वर्मा
                    (फिर से-41)
                   25-02-2017

Wednesday 15 February 2017

फिर से

किस प्रिय से मिलने को आतुर,
व्याकुल सी लगती धरा फिर से।
इक तो बसंत ,और अंगड़ाई,
कमनीय रूप धरा फिर से।।
गेंदा,गुलाब,चम्पा ,टेसू,
जूही,बेला से सजे गेसू;
पट पीत सुसोभित सरसो से,
हरियाली से रंग हरा फिर से।
                   -विजय वर्मा
                  (फिर से-39)
                 16-02-2017

फिर से

ना  जाने कैसे उग     आयी,
दिल के दरमियाँ दीवार फिर से।
झुकती सी महसूस हो रही,
उम्मीद वाली मीनार फिर से।।
आँख से नींद का यूँ  रूठ जाना,
बीच मे सपनों का टूट जाना;
खुद से ही अनबन लगती है,
मन लगता है बीमार फिर से।
                  -विजय वर्मा
                  (फिर से-38)
                 16-02-2017