Thursday 31 March 2016

फिर से

न अब से सिर  उठा  पाये,
कोई मन की कलह फिर से।
ये साँसे फिर महक  जायें,
चलो कर ले  सुलह फिर से।।
न जाने कब से इन आँखो ने,
सूरज को नहीँ देखा।
मिटा कर हर अंधेरे को,
चलो कर ले सुबह फिर से।।
                   (   फिर से-1)
              -विजय वर्मा
              25-03-2016

5 comments:

  1. अच्छी लगी ग़ज़ल. बहुत बढ़िया लिखा है आपने.

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  2. बहुत खूब ... सुलह कर लेना ही अच्छा ... अच्छी पंक्तियाँ हैं ...

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  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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