Friday 17 July 2015

चाहत नही बदली

हर शक्स है बदहाल सा,हालत नही बदली।
बदलते रहे किरदार,सियासत नही बदली।।
बस रंग बदलती रही,दीवार कई बार,
जो बारिश मे टपकती है,वो छत नही बदली।
वो दुश्मनी करता तो कोई बात भी होती,
आस्तीन के सांपो ने,अपनी फितरत नही बदली।
उडने की कोशिश मे वो दिन भर का दौडना,
बचपन चला गया ,मगर आदत नही बदली।
आँखो से उसे छूने पर ,मिलता कहाँ सुकून,
हाथो से चाँद छूने की,चाहत नही बदली।
-विजय वर्मा

2 comments:

  1. दीवारों के रंग बदल जाते हैं ... पर टपकती छत नहीं बदलती ...
    बहुत गहरा एहसास लिए भाव ...

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