Tuesday 2 April 2013

इस होली में किस की हो ली

धानी चूनर ओढ़े धरती ,
किस प्रियतम से मिलने आयी ;
बौराने लगे बागो में बृक्ष ,
नव यौवन ने ली अँगडाई ;
ये मादकता मौसम की है ,
फिर मानव कैसे बचे भाई !

जब दिल ने भाव पढ़े दिल के ,
और आँख किसी ने झपकायी ;
न वो हाँ बोली ,न वो ना बोली ,
बस आँख मिली और मुस्कायी ;
ऐसे में किसी को प्यार हुआ ,
ऐसे में किसी की याद आयी /

कुछ अलसाई ,कुछ सकुचाई ,
कुछ शरमाई आँखे  बोली ;
आ प्यार के रंग में रंग जाएँ ,
आ खेलें प्यार भरी होली ,
सच बतलाना मत बहलाना ,
इस होली में किस की हो  ली 


16 comments:

  1. सुंदर प्रेमपगी रचना

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  2. वाह बड़ी कोमल रचना।

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  3. कुछ अलसाई ,कुछ सकुचाई ,
    कुछ शरमाई आँखे बोली ;
    आ प्यार के रंग में रंग जाएँ ,
    आ खेलें प्यार भरी होली ,
    सच बतलाना मत बहलाना ,
    इस होली में किस की हो ली ..

    जब प्यार के रंगों में खेली होली तो काहे पूछे किसकी हो ली ... जिसने रंगा प्रेम से उसकी हो ली ...

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  4. बहुत सुन्दर बहुत प्यारी रचना...

    सच बतलाना मत बहलाना ,
    इस होली में किस की हो ली ..

    बधाई.

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  5. ''इस होली में किस की हो ली!''
    वाह! बहुत खूब.

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  6. bahut hi gahri bat sidhe sacche shabdon ke sath ....

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  7. अति मधुर ..बहुत ही अच्छी लगी .

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  8. बहुत खूब ....
    प्यार के रंग में सराबोर हो ली :)
    साभार !

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  9. सुंदर रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई और शुभकामनायें

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

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  10. सुन्दर रचना | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
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  11. BAHUT HI SUNDAR KAVITA..PADHKAR ACHHA LAGA..badhai

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  12. सुन्दर प्रवाह है आपके काव्य में.

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  13. 'होली' की सुंदर अभिव्यक्ति।

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