Saturday 24 September 2011

संघर्ष में प्रतिपल रहा हूँ

संघर्ष में प्रतिपल रहा हूँ /
संघर्ष में ही पल रहा हूँ /

वस्त्रहीनो के लिए मै,
ठण्ड में कम्बल रहा हूँ /
दृस्टहीनो के लिए मै ,
राह का संबल रहा हूँ /

ना रहे कोई अकेला ,
मीत बनकर चल रहा हूँ /
रोशनी सबको मिले ,
दीप बनकर जल रहा हूँ /

सोचना मत ,कि पिघलकर ,
व्यर्थ ही ,मै गल रहा हूँ /
देखना तेवर मेरे अब ,
गीत बन कर ढल रहा हूँ /
20-03-1999

17 comments:

  1. अद्भुत पंक्तियाँ, अप्रतिम सरलता।

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  2. आदर्श भावों की अभिव्यक्ति है।

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  3. एक बार फिर आपके शब्द कौशल ने मन्त्र मुग्ध कर दिया...नमन है आपकी लेखनी को...अद्भुत

    नीरज

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  4. सोचना मत ,कि पिघलकर ,
    व्यर्थ ही ,मै गल रहा हूँ /
    देखना तेवर मेरे अब ,
    गीत बन कर ढल रहा हूँ...

    bahut sundar rachna !

    .

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  5. ना रहे कोई अकेला ,
    मीत बनकर चल रहा हूँ /
    रोशनी सबको मिले ,
    दीप बनकर जल रहा हूँ /
    waah

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  6. आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।

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  7. बंधुवर आदरणीय विजय वर्मा जी
    सस्नेहाभिवादन !

    आपके ब्लॉग की सभी रचनाओं सहित यह गीत भी बहुत अच्छा है …
    संघर्ष में प्रतिपल रहा हूं
    संघर्ष में ही पल रहा हूं

    ना रहे कोई अकेला
    मीत बनकर चल रहा हूं
    रोशनी सबको मिले
    दीप बनकर जल रहा हूं

    प्रवाहमान सुंदर गीत के लिए आभार !


    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  8. हार्दिक शुभ कामनायें.

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  9. आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....विजय जी

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  10. बहुत सुन्दर रचना...

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  11. वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  12. बहुत खूब ...
    आप अच्छा लिखते हैं ! बधाई ..

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