Thursday 17 February 2011

ऐसे साथी की मुझको ,जरूरत नहीं

सच को सच कहने की ,जिसमे जुर्रत नहीं /
ऐसे साथी की मुझको ,जरूरत नहीं //

मेरी अंगुली कटी ,और मुस्काए वो ,
और कुछ भी हो ये ,पर मोहब्बत नहीं /

भाव दिल के मिले ,तो फिर लग जा गले ,
प्यार करने की कोई ,मुहूर्त नहीं /

16 comments:

  1. विजय जी अच्छी लगी यह ग़ज़ल नुमा कविता.. मुहूर्त पुल्लिंग है!! प्यार करने का कोई महूरत नहीं!!

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  2. wah wah vijay ji bahut badhiya sher kahe aapne
    Badhai swikare

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  3. बेहद सपाट वक्तव्य सत्य का।

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  4. यथार्थ और सही अंदाज में बात कही है.

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  5. छोटी सी कितु खूबसूरत गज़ल । बहुत साफ और स्पष्ट बात कही है ।

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  6. मेरी अंगुली कटी ,और मुस्काए वो ,
    और कुछ भी हो ये ,पर मोहब्बत नहीं /
    vaah
    और आखिरी शेर क्या बात है। बधाई।

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  7. भाव दिल के मिले ,तो फिर लग जा गले ,
    प्यार करने की कोई ,मुहूर्त नहीं
    bahut hi khoobsurat .

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  8. बहुत ही सुंदर

    पहली बार आपको पढ़ा

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  9. वहा वहा क्या कहे आपके हर शब्द के बारे में जितनी आपकी तरी की जाये उतनी कम होगी
    आप मेरे ब्लॉग पे पधारे इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद अपने अपना कीमती वक़्त मेरे लिए निकला इस के लिए आपको बहुत बहुत धन्वाद देना चाहुगा में आपको
    बस शिकायत है तो १ की आप अभी तक मेरे ब्लॉग में सम्लित नहीं हुए और नहीं आपका मुझे सहयोग प्राप्त हुआ है जिसका मैं हक दर था
    अब मैं आशा करता हु की आगे मुझे आप शिकायत का मोका नहीं देगे
    आपका मित्र दिनेश पारीक

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  10. भाव दिल के मिले ,तो फिर लग जा गले ,
    प्यार करने की कोई ,मुहूर्त नहीं ..

    Beautiful!...Too appealing !

    .

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  11. खूबसूरत गज़ल.. बहुत ही सुंदर

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  12. कल 12/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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