Tuesday, November 30, 2010

पहले कभी ना था


ये दिन जितना सुहाना आजकल पहले कभी ना था

ये मौसम आशिकाना आजकल पहले कभी ना था


तेरे आने का असर है या मुझे यूँ ही लगता है

ये दिल जितना दीवाना आजकल पहले कभी ना था

विजय कुमार वर्मा

जुलाई 2009

Saturday, November 13, 2010

कैसा हो गया मेरा गाँव


कैसा हो गया मेरा गाँव
सड़क के मायाजाल में गुम है प्यार की पगडंडी
दिल का दरवाजा बंद किए है मतलब की कुंजी
तेज धुप है गरम हवा है कहीं न दिखता छांव
कैसा हो गया मेरा गाँव
रमई का सिरदर्द यही पानी कैसे रोके
मगरू प्रधान का बहुत ख़ास उसको कैसे टोंके
चला रहे सब एक दूजे पर अपने अपने दाँव
कैसा हो गया मेरा गाँव

पक्के घर हो गए सभी इन्सान हुआ पत्थर
आपस में संबाद नहीं बाकी सब कुछ बेहतर
घायल है मखमली सतह पर जाने क्यों हर पाँव
कैसा हो गया मेरा गाँव

Wednesday, November 3, 2010

ऐसे दीप जलाएं



अंतस में जो कलुष भाव है ,उसको आज मिटायें


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं



रूठ के बच्चे से कोई ,बैठे ना दूर खिलौना


आँखों से रूठे ना कोई ,सुन्दर स्वपन सलौना


जिन्हें अभी तक गिले मिले ही ,उनको गले लगायें


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं



ढाबों पर नन्हे बच्चे जो ,बर्तन को धोते हैं


सबको खिलाते रहते हैं ,और खुद भूखे सोते हैं


अब तक जो कभी हँसे नहीं ,उनको आज हंसाएं


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं



आँख ना कोई गीली हो ,होठ ना कोई प्यासा


ना निराश हो कोई कभी ,हो बस आशा ही आशा


कोई कहीं गिर जाये कभी तो ,हाथ कई बढ़ जाएँ


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं


विजय कुमार वर्मा