Saturday, 18 September, 2010

अक्सर वो बुलाना उसका

कभी यादो में ,कभी ख्वाबों में जाना उसका
एक हलचल सी ,मचाती है ,याद आना उसका

धूप में जिन्दगी के ,पाँव जब जलते होते ;
छाँव में पलकों के ,अक्सर वो बुलाना उसका

चोर कह करके ,हौले से वो बदन का ढकना ;
और फिर खुद ही ,दुपट्टा गिरा देना उसका

कई दिनों के बाद मिलने पर भी ,कोई शिकवा गिला ;
मेरी सलामती की बातें ,और रो देना उसका

जिन्दगी कितनी अधूरी सी ,आज लगती है ;
मिल गया सब कुछ ,पर सिर्फ मिल पाना उसका

विजय कुमार वर्मा