Friday, 13 August, 2010

कैसे बिसरी


मोरे मन की बतिया सुनके मोहे पागल समझके मत हंस री
तुहका कुछ याद नहीं न सही मोरे मनमीत की ई नगरी
देखब कब तक लईके घुमबो सिर पर मोरे यादन की गठरी
कबहू तो कोइ ठोकर लगिहे जब ई गठरी जाइहे बिखरी
गठरी बिखरी तो कहा मानो जिनगी जहा बा जाई ठहरी
दिनवा के न मनवा में चैन रही रतिया अखिया में बहुत अखरी
भूलल बतिया बहु याद आईहे बतिया जिनमे थी घुली मिसरी
लारिकैयाँ कै यारी बतावा तुही मनवा में से कैइसे बिसरी

विजय कुमार वर्मा

5 comments:

  1. बहुत अच्छा ,लगे रहो
    अच्छी प्रस्तुती के लिये आपका आभार


    खुशखबरी

    हिन्दी ब्लाँग जगत के लिये ब्लाँग संकलक चिट्ठाप्रहरी को शुरु कर दिया गया है । आप अपने ब्लाँग को चिट्ठाप्रहरी मे जोङकर एक सच्चे प्रहरी बनेँ , कृपया यहाँ एक चटका लगाकर देखेँ>>

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  2. भूलल बतिया बहु याद आईहे बतिया जिनमे थी घुली मिसरी
    लारिकैयाँ कै यारी बतावा तुही मनवा में से कैइसे बिसरी

    ....बेहतरीन अभिव्यक्ति....अपनी बोली में और भी शानदार...बधाई.

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  3. bhojpuri mein ghazal padhkar man prafilit ho gaya..........

    badhaiya,,,,,,,,

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