Tuesday 24 August 2010

नया इतिहास बना डालें



आप अगर दें साथ ,नया इतिहास बना डालें
सूनी सूनी आखों में ,विश्वास जगा डालें
जिसके नीचे जाति-धर्म की हवा न चलने पाए ;
प्यार का ऐसा कोई ,नया आकाश बना डालें
घर में रहते है लेकिन ,बेघर से लगते हैं ;
क्यों न ?किसी के दिल को ही ,आवास बना डालें
छावं में पलकों के शायद ,शीतलता होती है ;
बैठ के दो पल ,जीवन की ,हर प्यास बुझा डालें
जाने कब रुक जाये सिलसिला ,चलती साँसो का ;
जीवन के हर पल को ही , मधुमास बना डालें

विजय कुमार वर्मा

Friday 13 August 2010

कैसे बिसरी


मोरे मन की बतिया सुनके मोहे पागल समझके मत हंस री
तुहका कुछ याद नहीं न सही मोरे मनमीत की ई नगरी
देखब कब तक लईके घुमबो सिर पर मोरे यादन की गठरी
कबहू तो कोइ ठोकर लगिहे जब ई गठरी जाइहे बिखरी
गठरी बिखरी तो कहा मानो जिनगी जहा बा जाई ठहरी
दिनवा के न मनवा में चैन रही रतिया अखिया में बहुत अखरी
भूलल बतिया बहु याद आईहे बतिया जिनमे थी घुली मिसरी
लारिकैयाँ कै यारी बतावा तुही मनवा में से कैइसे बिसरी

विजय कुमार वर्मा

Wednesday 4 August 2010

चाँद रूठा रहा जाने किस बात पर



चाँद रूठा रहा जाने किस बात पर ;


चांदनी के बिना रात रोती रही /


भीगा तन भीगा मन ,भीगा सारा जहाँ ;


आँखों से ऐसी ,बरसात होती रही /


ऐसे बादल उड़े ,जैसे आँचल कोई ;


जिन्दगी मन में ,जज्बात बोती रही /


शर्म से जिसके लव न खुले थे कभी ;


रात भर उनसे ही ,बात होती रही /


स्याह माहोल में ,जब धरा -नभ मिले ;


दिल से दिल की ,मुलाकात होती रही /


विजय कुमार वर्मा


इलाहबाद


२६-०१-१९९८