Wednesday, 28 July, 2010

सच्चाई


सच्चाई को
झुठलाया नही जा सकता /
औपचारिकतावश
हाथ मिला लेने से ही
मन नही मिला करता ;

जैसे किसी पौधे को कही से लाकर
घर की दहलीज पर
लगा देने मात्र से ही
उसमे फूल नही खिला करता /
उसके लिए उसे चाहिए
खाद
पानी
प्रकाश
हवा
और उसे चाहिए
समर्पित भावना /
अच्छे परिडाम की इच्छा हो
अच्छा है
लेकिन
मनोवांछित परिडाम न मिलने पर
मन के संयम के लिए धैर्य भी आवयश्क है /
परन्तु ऐसा बहुत कम होता है
देखकर
विज्ञापनी मुस्कराहट
सुनकर
भावात्मक फ़िल्मी संवाद
महसूस कर
मन के किसी जीर्ण शीर्ण
कोने में सोई
किसी पुरानी कल्पना
की झलक
उडाने लगते है
संबंधो की पतंग
बिना हवा के
बिना डोर के
बढ़ने लगती है अपेछायें
और इस तरह
आसमान पर चढने के बाद
जब गिरते है तो
खजूर पर भी नही अटकते
सीधे गिरते है जमीन पर
तब एहसास होता है
सच्चाई को
झुठलाया नही जा सकता


विजय कुमार वर्मा
०५-१२-१९९७-
स्थान -इलाहबाद