Thursday, 30 December, 2010

स्वागत नव वर्ष तुम्हारा


स्वागत नववर्ष तुम्हारा

जिन आँखों की आस अधूरी ,

उन सब आँखों का तारा

कोई मायूस न होने पाए ,

सबके हाथों को काम मिले /

हर घर में खुशहाली हो ,

मेहनत का उचित इनाम मिले /

बोझिल पलकों ने फिर से ,

हर्षित हो तुम्हें निहारा

स्वागत नव वर्ष तुम्हारा

कहीं न नफ़रत रहे जगत में ,

धरा स्वर्ग बन जाए /

प्रेम सूत्र में बधे विश्व यह ,

क्या अपने क्या पराये /

इर्ष्या द्वेष मिटे जग से ,

परिवार बने जग सारा

स्वागत नव वर्ष तुम्हारा

Tuesday, 30 November, 2010

पहले कभी ना था


ये दिन जितना सुहाना आजकल पहले कभी ना था

ये मौसम आशिकाना आजकल पहले कभी ना था


तेरे आने का असर है या मुझे यूँ ही लगता है

ये दिल जितना दीवाना आजकल पहले कभी ना था

विजय कुमार वर्मा

जुलाई 2009

Saturday, 13 November, 2010

कैसा हो गया मेरा गाँव


कैसा हो गया मेरा गाँव
सड़क के मायाजाल में गुम है प्यार की पगडंडी
दिल का दरवाजा बंद किए है मतलब की कुंजी
तेज धुप है गरम हवा है कहीं न दिखता छांव
कैसा हो गया मेरा गाँव
रमई का सिरदर्द यही पानी कैसे रोके
मगरू प्रधान का बहुत ख़ास उसको कैसे टोंके
चला रहे सब एक दूजे पर अपने अपने दाँव
कैसा हो गया मेरा गाँव

पक्के घर हो गए सभी इन्सान हुआ पत्थर
आपस में संबाद नहीं बाकी सब कुछ बेहतर
घायल है मखमली सतह पर जाने क्यों हर पाँव
कैसा हो गया मेरा गाँव

Wednesday, 3 November, 2010

ऐसे दीप जलाएं



अंतस में जो कलुष भाव है ,उसको आज मिटायें


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं



रूठ के बच्चे से कोई ,बैठे ना दूर खिलौना


आँखों से रूठे ना कोई ,सुन्दर स्वपन सलौना


जिन्हें अभी तक गिले मिले ही ,उनको गले लगायें


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं



ढाबों पर नन्हे बच्चे जो ,बर्तन को धोते हैं


सबको खिलाते रहते हैं ,और खुद भूखे सोते हैं


अब तक जो कभी हँसे नहीं ,उनको आज हंसाएं


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं



आँख ना कोई गीली हो ,होठ ना कोई प्यासा


ना निराश हो कोई कभी ,हो बस आशा ही आशा


कोई कहीं गिर जाये कभी तो ,हाथ कई बढ़ जाएँ


कहीं ठौर ना पाए अँधेरा ,ऐसे दीप जलाएं


विजय कुमार वर्मा


Wednesday, 20 October, 2010

चुनाव आ गया




उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न भागों में चुनाव कार्यक्रम चल रहा है ,इस सन्दर्भ में एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ ;जिसको १९९८ में लिखा था जब मै इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढता था /रचना बहुत पुरानी है लेकिन उम्मीद है आप लोगो को पसंद आयेगी


बदलने लगी रंगत कि ,फिर चुनाव आ गया


नभ से जमी पे ,नेता जी का पांव आ गया




नेता फुदक रहे ,जैसे बरसात के मेढक ,


मौसम में इस तरह का ,बदलाव आ गया




कहता है कौन गावं का ,विकास ठप्प है ,


बाज़ार में लाठी का देखो ,भाव आ गया




जब से हुआ सुधार ,राजनीति के द्वारा ,


गुंडों के आचरण में कुछ ,झुकाव आ गया




फुटपाथियो को फिर फलक का ख्वाब दिखाने,


मदारियों का झुण्ड फिर से गाँव आ गया




जिन बदलो से वर्षा की उम्मीद ,न रहे


दो पल सही ,तपती जमी पर छाँव आ गया


विजय कुमार वर्मा


स्थान -इलाहाबाद


1998

Saturday, 18 September, 2010

अक्सर वो बुलाना उसका

कभी यादो में ,कभी ख्वाबों में जाना उसका
एक हलचल सी ,मचाती है ,याद आना उसका

धूप में जिन्दगी के ,पाँव जब जलते होते ;
छाँव में पलकों के ,अक्सर वो बुलाना उसका

चोर कह करके ,हौले से वो बदन का ढकना ;
और फिर खुद ही ,दुपट्टा गिरा देना उसका

कई दिनों के बाद मिलने पर भी ,कोई शिकवा गिला ;
मेरी सलामती की बातें ,और रो देना उसका

जिन्दगी कितनी अधूरी सी ,आज लगती है ;
मिल गया सब कुछ ,पर सिर्फ मिल पाना उसका

विजय कुमार वर्मा

Tuesday, 24 August, 2010

नया इतिहास बना डालें



आप अगर दें साथ ,नया इतिहास बना डालें
सूनी सूनी आखों में ,विश्वास जगा डालें
जिसके नीचे जाति-धर्म की हवा न चलने पाए ;
प्यार का ऐसा कोई ,नया आकाश बना डालें
घर में रहते है लेकिन ,बेघर से लगते हैं ;
क्यों न ?किसी के दिल को ही ,आवास बना डालें
छावं में पलकों के शायद ,शीतलता होती है ;
बैठ के दो पल ,जीवन की ,हर प्यास बुझा डालें
जाने कब रुक जाये सिलसिला ,चलती साँसो का ;
जीवन के हर पल को ही , मधुमास बना डालें

विजय कुमार वर्मा

Friday, 13 August, 2010

कैसे बिसरी


मोरे मन की बतिया सुनके मोहे पागल समझके मत हंस री
तुहका कुछ याद नहीं न सही मोरे मनमीत की ई नगरी
देखब कब तक लईके घुमबो सिर पर मोरे यादन की गठरी
कबहू तो कोइ ठोकर लगिहे जब ई गठरी जाइहे बिखरी
गठरी बिखरी तो कहा मानो जिनगी जहा बा जाई ठहरी
दिनवा के न मनवा में चैन रही रतिया अखिया में बहुत अखरी
भूलल बतिया बहु याद आईहे बतिया जिनमे थी घुली मिसरी
लारिकैयाँ कै यारी बतावा तुही मनवा में से कैइसे बिसरी

विजय कुमार वर्मा

Wednesday, 4 August, 2010

चाँद रूठा रहा जाने किस बात पर



चाँद रूठा रहा जाने किस बात पर ;


चांदनी के बिना रात रोती रही /


भीगा तन भीगा मन ,भीगा सारा जहाँ ;


आँखों से ऐसी ,बरसात होती रही /


ऐसे बादल उड़े ,जैसे आँचल कोई ;


जिन्दगी मन में ,जज्बात बोती रही /


शर्म से जिसके लव न खुले थे कभी ;


रात भर उनसे ही ,बात होती रही /


स्याह माहोल में ,जब धरा -नभ मिले ;


दिल से दिल की ,मुलाकात होती रही /


विजय कुमार वर्मा


इलाहबाद


२६-०१-१९९८


Wednesday, 28 July, 2010

सच्चाई


सच्चाई को
झुठलाया नही जा सकता /
औपचारिकतावश
हाथ मिला लेने से ही
मन नही मिला करता ;

जैसे किसी पौधे को कही से लाकर
घर की दहलीज पर
लगा देने मात्र से ही
उसमे फूल नही खिला करता /
उसके लिए उसे चाहिए
खाद
पानी
प्रकाश
हवा
और उसे चाहिए
समर्पित भावना /
अच्छे परिडाम की इच्छा हो
अच्छा है
लेकिन
मनोवांछित परिडाम न मिलने पर
मन के संयम के लिए धैर्य भी आवयश्क है /
परन्तु ऐसा बहुत कम होता है
देखकर
विज्ञापनी मुस्कराहट
सुनकर
भावात्मक फ़िल्मी संवाद
महसूस कर
मन के किसी जीर्ण शीर्ण
कोने में सोई
किसी पुरानी कल्पना
की झलक
उडाने लगते है
संबंधो की पतंग
बिना हवा के
बिना डोर के
बढ़ने लगती है अपेछायें
और इस तरह
आसमान पर चढने के बाद
जब गिरते है तो
खजूर पर भी नही अटकते
सीधे गिरते है जमीन पर
तब एहसास होता है
सच्चाई को
झुठलाया नही जा सकता


विजय कुमार वर्मा
०५-१२-१९९७-
स्थान -इलाहबाद




Saturday, 8 May, 2010

उचित फैसले ले ले

अभी समय है कुछ उचित फैसले ले ले
कहीं पर दूरियां और कहीं फासले ले ले
युद्ध में प्यार की भाषा को कौन समझेगा
अपने तरकश में कुछ तीर विष घुले ले ले
तोड़ के पंख मेरे इतना क्यों इतराता है
हार तब मानूगा जब मन के हौसले ले ले
विजय कुमार वर्मा
दिसम्बर 2009