Sunday, 26 July, 2009

कैसे बिसरी

मोरे मन की बतिया सुनके मोहे पागल समझके मत हंस री
तुहका कुछ याद नहीं न सही मोरे मनमीत की ई नगरी
देखब कब तक लईके घुमबो सिर पर मोरे यादन की गठरी
कबहू तो कोइ ठोकर लगिहे जब ई गठरी जाइहे बिखरी
गठरी बिखरी तो कहा मानो जिनगी जहा बा जाई ठहरी
दिनवा के न मनवा में चैन रही रतिया अखिया में बहुत अखरी
भूलल बतिया बहु याद आईहे बतिया जिनमे थी घुली मिसरी
लारिकैयाँ कै यारी बतावा तुही मनवा में से कैइसे बिसरी

Saturday, 18 July, 2009

मेरे लिए

तेरे रस्ते मेरे दिल की तरफ़ जो मुङ गए होते
बादल बेकसी के जाने कब के उङ गए होते
कदम मेरे बंधे थे साथ तेरे चल न पाये ऐ
तुम्हीं मेरे लिए दो पल कहीं पर रूक गए होते
विजय कुमार वर्मा

कैसा हो गया मेरा गाँव


कैसा हो गया मेरा गाँव
सड़क के मायाजाल में गुम है प्यार की पगडंडी
दिल का दरवाजा बंद किए है मतलब की कुंजी
तेज धुप है गरम हवा है कहीं न दिखता छांव
कैसा हो गया मेरा गाँव
रमई का सिरदर्द यही पानी कैसे रोके
मगरू प्रधान का बहुत ख़ास उसको कैसे टोंके
चला रहे सब एक दूजे पर अपने अपने दाँव
कैसा हो गया मेरा गाँव
पक्के घर हो गए सभी इन्सान हुआ पत्थर
आपस में संबाद नहीं बाकी सब कुछ बेहतर
घायल है मखमली सतह पर जाने क्यों हर पाँव
कैसा हो गया मेरा गाँव
विजय कुमार वर्मा

Saturday, 11 July, 2009

गिरने के बाद जो खुद ही संभल सकता है,
वो अपने हाथ की रेखा भी बदल सकता है
हवा की चाल जिसने गौर से महसूस किया
वो ज़माने से बहुत आगे निकल सकता है
आप का मैं ब्लॉग जगत मैं स्वागत करता हु और आशा करता हु की आप हमें विचारो से अवगत कराएँगे